दोस्ती और राखी दोनो का फ़र्ज़ निभाया 2

हाय दोस्तों Antarvasna मैं अमन एकबार फिर Kamukta से आपके सामने हाजिर हूँ दोस्तों मेरी पहली कहानी “दोस्ती और राखी दोनों का फ़र्ज़ निभाया भाग 1” को आप सभी पाठकों ने काफ़ी पसंद किया था मैं कुछ जरूरी काम में व्यस्त होने के कारण कहानी का अगला भाग आप लोगों तक समय पर नहीं पहुँचा सका इसके लिए मैं आप सभी से माफ़ी माँगता हूँ लेकिन तब से लेकर आज तक मैनें कामलीला डॉट कॉम पर प्रकाशित सभी कहानियाँ पढ़ी है और आज मैं आपको अपनी अधूरी कहानी बताने जा रहा हूँ।

अब आगे…

दीदी अब बिना आवाज़ किए, चुप-चाप उसका साथ देने लगी थी मैं समझ गया था कि दीदी कोई भोली-भाली लड़की नहीं है यह तो एक नंबर की चुड़क्कड़ लड़की है बुत्तन के हाथ कभी उसके बब्स पर घूम रहे थे तो कभी कमर पर मुझे भी बहुत मज़ा आ रहा था दीदी को बुत्तन की बाहों में देखकर पर इस बात का डर भी था कि कोई आ ना जाए वरना पूरे गाँव में बदनामी होगी और पापा से पिटाई होगी सो अलग तो मैं जितना हो सके उतना चारों तरफ नज़र रखे हुए था पर उन दोनों को तो मानो किसी बात का होश ही नहीं था।

दीदी :- आअहह… ईसस्सह … आह्ह्ह

बुत्तन ने फिर कुछ देर बाद दीदी को उल्टा किया और अपने एक हाथ को उसके कुर्ते के ऊपर से अंदर डाल दिया, ऐसा करते ही दीदी का एक बब्स उसके हाथ में आ गया था फिर तो उसने बब्स को आहिस्ते-आहिस्ते दबाते हुए अपनी नेकर को नीचे खिसकाया अब तो वह सिर्फ़ एक टी-शर्ट में ही था उस साले ने चड्डी भी नहीं पहन रखी थी ऐसा लग रहा था कि वह इसकी पहले से ही तैयारी करके आया हो फिर जब उसका लंड नेकर से बाहर आया तो मैं चौंक पड़ा… 7-7.5 इंच लम्बा और 3” की मोटाई वाला एकदम काला लंड, उसके लंड का टोपा उस अंधेरे में भी लाल बत्ती की तरह मेरी आँखो में चमक उठा मैं भी पेड़ की आड़ में छुपके से अपने लंड को निकालकर देखने लगा तो मुझे शर्म सी आई मेरा तो 5” से भी कम था फिर जब तक मैं अपने लंड को नाप रहा था तब तक वह साला मेरी दीदी की सलवार के नाडे को खोलकर सलवार को नीचे सरका चुका था और दीदी की पैन्टी के ऊपर से ही उनके पीछे से अपने लंड को आँख बंद कर के रगड़ रहा था और ऊपर से उसके हाथ अब भी दीदी के कुर्ते और ब्रा के अंदर ही थे।

दीदी :- ओह्ह्ह… आहहा… ईयइ… इस्स्स्स

फिर उसने जल्दी से दीदी को पलटा और नीचे बैठकर उसकी टाँगों को झटके से खीचा तो दीदी उस गद्दे जैसे धान के गुच्छो पर धम्म से बैठ गई और फिर बुत्तन ने उसकी सलवार को खीच के पैरों से बाहर निकाल दिया फिर मैनें देखा कि दीदी पसीने से लत-पथ है और हांफ भी रही थी इतने में बुत्तन ने दीदी की जाँघो के दोनों तरफ हाथ लिये और दीदी की पैन्टी को सरकाते हुए खोल दिया दीदी ने भी उसका साथ देते हुए अपने पैर हवा में उठा दिए।

फिर दीदी ने अपने पैर आपस में जोड़ लिए थे पर बुत्तन के एक ही झटके से उसके पैर अलग-अलग हो गये थे और मुझे इस बात की हैरानी थी कि कितनी जल्दी बुत्तन ने दीदी को इस हालत में ला दिया था अभी 15 मिनट ही हुए होंगे कि दीदी और वह दोनों ही कमर से नीचे पूरे नंगे पड़े थे और दूसरी तरफ मैं यह देख रहा था कि हमारे साथ खेलने वाले बाकी के बच्चे आ क्यों नहीं रहे उनको ढूँढने शायद वह अब भी डर के छुपे हुए थे राक्षस से, पर यहाँ पर तो बुत्तन सचमुच का राक्षस बन चुका था मेरी जवान दीदी को पाकर फिर जैसे ही बुत्तन ने दीदी के फैले हुए पैरों के बीच उसकी चूत देखी तो उसके तो होश ही उड़ गए थे दीदी की दूध जैसी चूत पर डिज़ाइन से कटी हुए झांटें चूत की दोनों पंखुड़ियाँ एक दूसरे को गले लगाए हुए थी चूत असल में इतनी सुंदर होती है यह तो बुत्तन को मालूम ही नहीं था वह ऐसे तो कई लड़कियों के बब्स दबा चुका था पर इतनी जल्दी कोई लड़की उसे अपनी चूत आसानी से दे देगी यह तो उसने सोचा भी नहीं था वह कुछ देर तक तो सिर्फ़ उसे ही देखता रहा दीदी भी उसको तिरछी नज़रों से देख रही थी।

बुत्तन :- दीदी मैनें सुना है कि चूत की महक बहुत अच्छी होती है।

दीदी :- चुप कर पागल. यह चूत अभी पसीने से गीली है तो इसमें से बदबू आएगी मत सूंघ इसको।

दीदी की इन बातों ने मेरे भी कान खड़े कर दिए और मैं यह सोचने लगा कि दीदी कितनी बेशरम और चरित्रहीन है पर घर में तो एकदम सीधी बनकर रहती है।

बुत्तन :- हाय… तुम्हारे पसीने की खुशबू भी तो बहुत कमाल की है, देखते है चूत के पसीने में ऐसा क्या जादू है।

ऐसा कहकर उसका चेहरा दीदी के पैरों के बीच कहीं छुप गया और दीदी ने अपने एक हाथ को अपने मुहँ पर रख लिया और फिर

बुत्तन :- हाय… क्या महक है इस चूत की तुम तो एकदम लाजवाब हो दीदी।

दीदी :- आअहह… ऊऊ.. म्माआ बब्ब्बुत्तन… ऊहह …

बुत्तन दीदी की जाँघों को अपने दोनों हाथों से पकड़कर उसकी चूत को खाए जा रहा था और उसकी चूत को चाट भी रहा था बुत्तन की लार किसी कुत्ते से भी ज़्यादा टपक रही थी वह दीदी के पैरों के बीच में लगातार चाटे जा रहा था उसकी लार दीदी की गांड से भी बहने लगी थी दीदी की आँखें बंद थी उसके हाथ खुद के ही घुँगराले बालों को नोच रहे थे और सारा बदन बुखार की तरह कांप रहा था दाँत कीट-कीट कर बज रहे थे उसकी सिसकारियां अब और तेज हो गई थी और फिर दीदी के हाथ और पैर दोनों बुत्तन के सिर को अपने पैरों के बीच में खींचने लगे थे और दीदी की कमर ज़मीन से ऊपर उठकर धनुष जैसी हो गई थी।

दीदी :- ऊहह… ऊह्ह्ह … ईसस…गईी… रे… ईईईईई…

और दीदी झड़ गई, और उसका बदन ढीला पड़ गया उसके माथे पर से पसीने की बूंदे आने लगी थी उसके दोनों हाथ और पैर दो तरफ खुल गये पर बुत्तन चूत को चाटता ही जा रहा था मानों जैसे उसमें से कोई रस बह रहा हो तभी मुझे खेल के मैदान की ओर से शेरा के आने की आवाज सुनाई दी वह इसी तरफ आ रहा था और बोल रहा था अरे ओ बुत्तन कहाँ हो तुम सब लोग?

अब मेरी धड़कनें और तेज हो गई थी पर वह दोनों तो जैसे बहरे ही हो गए थे मैनें उनकी तरफ देखा तो दीदी वैसे ही पड़ी थी और साला बुत्तन अपने लंड को लेकर दीदी की गीली चूत की ओर बढ़ रहा था मेरी तो अब गांड फट रही थी अगर यह अन्दर डालने में कामयाब हो गया तो फिर रोकना नामुमकिन हो ज़ाएगा।

मैं पेड़ के पीछे से छुपे हुए ही चिल्लाया कि – अरे बुत्तन, और दीदी तुम लोग, कहाँ हो हम लोग तुम सबको कब से ढूंढ रहे है?

मेरे जोर से आवाज़ देने से दीदी के कान खड़े हो गए, और उसने बुत्तन को धक्का दे दिया और उठ खड़ी हुई यह देखकर बुत्तन तो जैसे बौखला सा गया और कहने लगा कि रुक जाओ बस दो मिनिट और

दीदी :- नहीं मेरा भाई आ चुका है हम फिर कल मिलेंगे।

बुत्तन ने तो ज़िद पकड़ ली तो दीदी ने उससे कहा कि वह कल ज़रूर आएगी और दोनों ने अपने-अपने कपड़े पहन लिए और फिर मैं भी उनके सामने आ गया तो वहाँ पर शेरा भी आ पहुँचा हमको वहाँ देखकर वह दोनों थोड़े घबराए थे पर बुत्तन ने कहा

बुत्तन :- वो… क्या है… ना… दीदी गिर गई थी तो उनको संभालते हुए थोड़ी देर हो गई।

शेरा दीदी के बिखरे बाल कपड़े और नीचे के भीगे धान के पेड़ों को देखकर शक की नज़रों से उन दोनों को देखने लगा मुझे भी लगा कि कही यह सब कुछ जान ना जाए।

मैं :- हाँ, शेरा, मैं और बुत्तन दीदी को संभाल के ला रहे थे।

दीदी मेरी बातों को सुनकर बुत्तन की ओर देखने लगी तो बुत्तन ने उसे एक आँख मार दी फिर तो जब हम घर तक आए तब तक दीदी के मुहँ से एक आवाज़ तक नहीं निकली उसे पता चल चुका था कि मैं भी जान चुका हूँ, उसे बहुत शर्म आ रही थी रात को भी हम दोनों में कोई बात नहीं हुई. सुबह जब मैं स्कूल गया तो बुत्तन वहाँ मुझे ड़ाँटने लगा।

बुत्तन :- साले, तू थोड़ी देर उस शेरा को रोक लेता तो मेरा काम हो जाता मेरे इस लंड ने कल से मुझे परेशान कर रखा है तू तो दोस्ती के नाम पर कलंक है।

मैं :- चुप कर हरामी, तुझे अपनी लंड की पड़ी है इधर मुझे मेरी दीदी की चिंता हो रही है कही वह शर्म से आत्महत्या ना कर ले।

बुत्तन :- क्या बक रहा है, ऐसा नहीं हो सकता तू आज ही स्कूल के बाद ही उससे बात करना उसे समझाना कि तू शुरू से ही उसे मुझसे सेट करवाना चाहता था बस फिर वह ठीक हो जाएगी और उसे आज लेकर ज़रूर आना, लेकिन आधा घंटा पहले।

मैं :- आधा घंटा पहले क्यों?

बुत्तन :- हा हा हा… आज हम खेलेंगे नहीं क्या, और मैं क्या तेरी दीदी को झाड़ी के अंदर लेकर चोदुंगा… ईीई… हे हे…

मैं:- वह तो ठीक है, पर क्या वह आज आएगी?

बुत्तन :- ज़रूर आएगी, वादा किया है उसने मुझसे. और तू बस उसे ले आना।

हम स्कूल से घर लौट गये उस दिन, दोपहर को मैं हिम्मत करके दीदी से बात करने गया तो दीदी पहले तो सब सुन रही थी फिर मैनें कहा कि मुझपर भरोसा रक्खो मैं मम्मी-पापा से कुछ भी नहीं कहूँगा दीदी फिर अचानक से मुझे गले लग गई और रो पड़ी और कहने लगी

दीदी :- भाई, तूने आज सच में राखी की इज़्ज़त रख ली तुमने अपनी बहन की रक्षा करी है आज. तो क्या तुम आज फिर से मेरी रक्षा करोगे?

मैं :- हाँ दीदी, पर किससे?

दीदी :- जब मैं और बुत्तन आज भी झाड़ी में छुपकर चुदाई करेगें तो तुम बाहर से निगरानी रखना।

उसके मुहँ से यह बात सुनकर, क्या बोलूँ मुझे कुछ समझ ही नहीं आया कि ऐसी रक्षा !!! भला कौन बहन माँगेगी !!! फ़िर भी दीदी का दिल रखने के लिए मैनें उनको हाँ कह दिया हम प्लान के मुताबिक आधा घंटा पहले मम्मी को खेलने जा रहे है ऐसा कहकर घर से निकल पड़े, वहाँ बुत्तन ने बाकी सबको कह दिया था कि आज मैदान में कीर्तन होगा तो हमारा खेल बन्द करवा दिया बस फिर क्या था मैं जैसे ही दीदी को लेकर झाड़ी के पास पहुँचा तो बुत्तन वहाँ पहले से खड़ा होकर मुस्कुरा रहा था उसने सिर्फ़ एक नेकर ही पहन रखा था और कुछ पहनना मुनासिब नहीं समझा था उसने. और वह हमें देखकर मुस्कुराने लगा वह आकर दीदी को मेरे पास से लेकर चला गया मुझे तो बहुत जलन हुई और ऐसा लगा कि मानों वह मेरी बीवी को लेकर जा रहा हो वह क्या दिन था मैं अपनी ही प्यारी दीदी को इस चूतिये से चुदवाने लाया था पर मैं करता भी क्या… जब बुत्तन और दीदी राज़ी तो क्या करेगा काज़ी।

फिर वह दीदी को लेकर झाड़ी के अंदर चला गया और मैं वहाँ चोकीदार के जैसे खड़ा था मुझे थोड़ी उत्सुकता भी हुई कि देखूँ तो सही अंदर जाकर कि आखिर हो क्या रहा है फिर मैनें चारों ओर देखा तो दूर-दूर तक कोई नहीं दिखा तो फिर मैं भी अंदर चला गया।

और वहाँ जाकर देखा तो…

दीदी की काली ब्रा में से उसके बब्स बाहर निकलने को तड़प रहे थे ब्रा के हर कोने से बब्स के कुछ-कुछ हिस्से बाहर निकल रहे थे वह उसके बब्स पर ब्रा के ऊपर से काट रहा था फिर ऐसा करते हुए वह नीचे आता है और दीदी की सलवार और पैन्टी को खींचकर पैरों तक ले आया था दीदी भी अपने पैरों से उसे निकालकर फेंक देती है इतना करके बुत्तन उठा और दीदी की काली ब्रा को दोनों बाजूओं से खिसका देता है पर अब भी बब्स ब्रा कप से आधे ढके हुए थे मैं तो तरस गया था दीदी के निपप्ल को देखने के लिए।

पर बुत्तन बब्स को छोडकर दीदी को फिर से चूमने लगा अब दीदी ने खुद ही अपनी ब्रा को खींचकर अपने पेट तक ला दिया और फिर मुझे जो दिखा वह तो लाजवाब था दो दूध से भी सफेद बब्स और उनपर छोटे-छोटे निपप्ल बिल्कुल दीदी के होठों के जैसे गुलाबी थे मुझे भी अब लालच होने लगा था अपनी ही दीदी की जवानी को देखकर फिर दीदी ने बुत्तन के सिर को नीचे लाकर अपने एक बब्स पर लगा दिया फिर तो उस हरामी बुत्तन का मुहँ दीदी के मुलायम बब्स पर गिलहरी के जैसे चलने लगा वह उनको च्चप-च्चप की आवाज़ से चूस रहा था।

दीदी :- आह्ह्ह्ह उफ्फ्फ्फ़ इस्सस

पढ़ते रहिए दोस्तों क्योंकि कामलीला पर कहानी अभी जारी है…

धन्यवाद् मेरे प्यारे दोस्तों !!

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