काली दुनिया का भगबान 4

मेरे जिस्म को एक तेज झटका लगा था । मैंने
पहले आंखें खोल दीं और एक झटके से सीधी
होकर बैठ गई । जोगा रुक चुका था । जोगे का पिछला दरवाजा खुला । अगले क्षण
उसमें से एक एक करके सैनिक नीचे कूदने लगे
। जब सारे सैनिक नीचे उतर चुके तो उनमें से
एक मुझे घूरता हुआ कर्कश स्वर में
बोला-“नीचे उतरो ।” मैँ शराफत के साथ नीचे को उतर गई । फिर वे मुझे घेरकर आगे बढे । मैंने धुमाकर चारों तरफ का मुआयना किया ।
वह काफी लंम्बी-चौडी खुली जगह थी ।
उसमें जगह-जगह कैम्प लगे हुए थे । एक तरफ
ऊची ऊंची पहाडियों का सिलसिला दूंर
तक चला गया था । दूसरी तरफ बैरक्स बनी हुई
थीं । वहां एक दर्जन के आसपास फौजी जीपें खडी नजर जा रहीं थीं । हैलीपेड पर कई
हैलीकॉप्टर शान से सिर ऊंचा किये खड्रे थे,
जगह-जगह सिक्योरिटी का तगड़ा प्रबन्ध्र
था । चारों तरफ पर्याप्त प्रकाश फैला हुआ था । वे मुझे लेकर अपने कमाण्डर के पास पहुचे। यह एक छ फुट से भी ऊपर निकलते कद और
मज़बूत जिस्म वाला शख्स था । उम्र
पैतालिस साल के आसपास रही होगी । रंग
कश्मीरी सेब जैसा था । बडी-बडी मूंछें । चेहरे
पर पत्थर जैसी कठोरता और आँखे यूं सुर्ख
नजर आ रहीँ थीं, मानो वहां दो अंगारे सुलग रहे हीं । “ये लड़की कौन है?” कमाण्डर ने सैनिकों से
सबाल किया । ” इसके बारे में हम कुछ नहीं जानते सर ।” एक
सेनिक ने जवाब दिया—-“ये कुछ देर पहले
एक विमान से पैराशूट द्वारा नीचे कूदी थी ।
हम इसे पकडकर आपके पास ले आये ।” कमाण्डर के चेहरे के भाव तेजी से बदले, फिर
बह मुझे उपर से नीचे तक घूरता हुआ
गुर्राया—-” कौन हो तुम?” इस परिस्थिति में भी मैं अपनी आदत से
बाज नहीं आई–: “एक लडकी हूं” |

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