काली दुनिया का भगबान 3

कुछं देर बाद वे सैनिक मुझे जिस जगह लेकर पहुचे, वहां पर्याप्त उजाला था । वहां एक जोंगा, खड़ा था ।

वे संख्या में चार थे ।

चारों के कन्धों पर रायफलें लटकी हुई थी । चारों के चेहरे इस बात की चुगली खा रहे थे, अगर मैंने कोई भी हरकत की तो पलक झपकते ही उनकी रायफल कंधों से उतरकर उनके हाथों में आ सकती थी और वे मुझे शूट करने में जरा भी हिचकिचाने वाले नही थे ।

“इसे जोंगे में बिंठाओ !” उनमें से एक अपने साथियों को सम्बोधित करके आदेश पूर्ण स्वर में बोला ।

“चलो ।” पीछे से एक मेरे नितम्बों पर बूट की ठोकर जडता हुआ गुरोंया ।

ठोकर इतनी जबरदस्त थी कि मैं बिलबिला उठी ।

मुझे उस सेनिक की इस हरकत पर गुस्सा तो वहुत आया, किन्तु फिलहाल दांत पीसकर रह जाने के अलावा और कुछ भी नहीं कर सकी थी ।

मैँ आगे बढकर जोंगे के करीब पहुंची ।

तभी ।

उनमें से एक सेनिक ने मेरे हाथ पीठ पीछे करके रेशम की मजबूत डोरी से जकढ़ दिये, फिर मुझे जोगे में बिठा दिया गया ।

उसमें पहले से ही दो सेनिक मौजूद थे।

वे चारों भी जोगे में बैठ गये ।

जोंगा चल पड़ा ।

मेरी स्थिति अजीब थी । मेरे हाथ पीठ पीछे मंजबूती से बधे हुए थे । दो सैनिकों की रायफलों की नाले मेरे जिस्म से चिपकी हुई थीं । मैं चाहकर भी कोई हरकत नहीं कर सकती थी । जोंगे का वो हिस्सा चारों तरफ से बन्द था । इसलिये मुझे बाहर का कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था ।

“तुम लोग मुझे कहां ले जा रहे हो?” एकाएक में बोल उठी ।

“सवाल नहीं ।” मेरे दायीं तरफ बैठा सैनिक गुर्राया ।

“क्यों?”

“खामोश ।” इस बार दूसरा सैनिक दहाड़ा । मैंने होंठ भींच लिये ।

मैंने ये सोचकर सब्र कर लिया- शीघ्र ही सब कुछ मेरे सामने आ जायेगा । इसलिये सैनिकों से सिर मारना बेकार है । वे तो पहले ही मुझसे जैसे खार खाये बैठे थे ।

मैंने सीट को पुश्त से पीठ सटाकर आँखे बन्द कर ली ।
मै फस चुकी थी । आगे पता नही मुझ पर क्या गुजरने वाली थी ? मेरे वर्तमान मिशन की शुरुआत ही खराब हुई थी ।।

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