कमीना चाहे नगीना

बहुत समय पहले एक विपु नाम का मजदूर एक फैक्ट्री में पत्थर तोड़ने का कार्य करता था। फेक्ट्री के मालिक पंडत अज्जुनाथ थे। बड़े दयालु गरीब औरतो की हमेशा मदद करने वाले ।

उनके बाग़ में एक भरपूर बदन की कमसिन युवती नाम केशू रानी काम करती थी। वो कजरारे नयनो, उन्नत स्तन , पतली कमर, उन्नत नितम्ब की मलिका थी। आवाज ऐसी जैसे कोयल कुक रही हो। होंठ शहद से भरपूर, गुलाब के फूल की तरह कोमल जिस्म, बलखाती कमर, लहराते लंबे बाल नितम्बो से छेड़ छाड़ करते रहते।

एक दिन एक बार बगिया में वो सेठ अज्जु की पूजा के लिए फूल चुनने गयी तो वँहा वो कपटी मजदूर विपुल क्यारियों की खुदाई और चिनाई में व्यस्त था। मुर्ख प्राणी ने कई फूलो को नष्ठ कर दिया था।

यह देख केशु क्रोधित हो गयी और एक लात घुमा के विपु मजदूर के नितम्बो पे मारी।

लज्जा और अपमान से विपु शर्मिदा हो गया और मन ही मन अपमान की ज्वाला में गांड तक जलने लगा

उसने एक नजर केशु के थिरकते नितम्बो पर डाली और माफ़ी मांगता हुआ चला गया।

उसी शाम गाँव के बाहर वाले शमशान घाट के दायीं तरफ वाली सड़क पे बने देसी दारु के अड्डे पर अपने अखण्ड चुतिया दोस्त बंसी लंगुरा के साथ दारू और गांजे के सुट्टे लगा रहा था।

दोनों कपटी उस दिलकश हसीना केशु से बदला लेने की योजना पर अपना चुतिया दिमाग घिस रहे थे।

देसी दारु और कच्चे चंने चाबने के बाद भी दोनों मूढ़मति मूर्खो की तरह आपस में बतिया रहे थे की कैसे उस शहद की बोतल केशु का शहद चाटने को मिले।

वक्त की मार ..
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तभी उधर से गुजरते हुए काका लँडेत की नजर उन दोनों पे पड़ी। और वो दबे पांव उनकी योजना सुनने लगा।
और जैसे ही इन दोनो अखण्ड चूतियों की योजना की भनक पता लगी उसकी आँखे क्रोध की ज्वाला में जलने लगी। बाजू फड़कने लगी।
उसका विशाल अजगरी मूसल लण्ड मारे क्रोध के फुफ्कारे मारने लगा।

और तभी उसने देखा की दोनों कपटी विपुल और बंसी लंगुरा गांजे के अत्यधिक नशे में एक दूसरे की गांड सहलाने लगे थे और केशु मेरी है का गाना गा रहे थे, बीच बीच में एक दूजे की गांड में ऊँगली भी कर देते थे।

यह देख काका लँडेट को इन दोनों से घृणा हो गयी और वो सीधा अजयनाथ जी की हवेली की और निकल पड़ा।

अजयनाथ जी की हवेली पहुँच कर दरबान से पता लगा की सेठजी तो गुडगाँव गए है बंसी लंगुरा के खेत जब्त करने ।
तभी दरबान ने काका लँडेट को बोला आप आंगन में जा के विश्रांम करो। सेठ अजयनाथ जी थोड़ी देर में आते होंगे।

आंगन में पहुंचने पर काका को अत्यंत सुरीली मादक ध्वनि में कोई गीत गुनगुनाता हुआ सुनाई दिया।

गीत के बोल ….टिप टिप बरसा पानी
पानी ने आग लगाई।

थोड़ा आगे बढ़ने पर काका लँडेट कांप उठा और सामने देखा कि ……….

सामने आंगन में कुएं के समीप वही शहद की बोतल भरपूर जवानी से लदी हुई केशु अपने उन्नत उरोजों पर एक पतला झीना सा कपड़ा लपेटे नहा रही थी। पतली कमर उभरे हुए विशाल नितम्ब गीत के बोल पर धीमे धीमे थिरक रहे थे।

काका लँडेट को जैसे काठ मार गया और वही जमीन पे उकड़ू हो के बैठ गया। उसकी जबान को ताला लग गया था और वो फ़टी आँखों से ये अद्धभुत नजारा निहारने लगा था।

भूल गया कि वो किसलये यहाँ आया था।

क्रमशः

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