कापालिनी लोपमुद्रा और राजकुमार अमोध 1

“हे राजगुरु अब आप ही कुछ मार्गदर्शन दीजिए” महाराजा नकुल देव ने चिंतित स्वर मे पूछा. Hindi Sex Stories Antarvasna Kamukta

राजगुरु वाचस्पति ने कुछ क्षण सोच कर कहा “राजन, राज्या के युवा पुरुषों का इस तरह गायब होते जाना और नवयुवतियो का मानसिक संतुलन खो देना निश्चित ही चिंता का कारक है”

“मुझे यह लगता है की आपने उस डाकिनी लोपमुद्रा को जो राज्या के पशुओ का भक्षण करने की अनुमति दी है वह इस अनुमति का लाभ उठा कर नवयुवको और नव युवतियो का दोहन करके उनकी हत्या कर रही है”

लोप मुद्रा का नाम सुनते ही नकुल देव की रंगत बदल गयी उनका चेहरा उतर गया. हालाँकि वी सिर्फ़ 55 वर्ष के थे मगर पिछले वर्ष नयी पटरानी का वरण करने के पश्चात उनकी अवस्था एक दम ढल गयी थी.

नकुल देव भानगड के महाराजा थे और उनकी कद काठी और तेज़ मान मे अपने आप सम्मान और भय पैदा करते थे. उनके चाल ढाल लहज़ा सब रौबिला था. 50 पार करने के बाद भी वे 30 वर्ष के नययुवा लगते थे.

इस उमर मे नयी रानी का वरण करने के बाद अचानक ही वो ढलने लगे.

राज वैध के बनाए काढ़े और अवलेह का भी कुछ खास असर हो नही रहा था. उनके शरीर से माँस मोम की तरह पिघलता जा रा था.

आज राजगुरु ने उन्हे कई महीनो बाद देखा था क्योकि राजगुरु पिछले एक वर्ष से हिमालय मे साधनरत थे. राजगुरु को लौटे कुछ ही घंटे हुए थे और महाराज ने उन्हे बुला भेजा

राजगुरु को यह पता चला की राज्यो के सीमावर्ती इलाक़ों मे अचानक ही नवयुवक गायब हो र्हे थे और कई युवतियाँ अचानक ही अपना मानसिक संतुलन खो र्ही थी.

उनकी छटी इंद्री ने उन्हे आगाह कर दिया था की हो ना हो इन घटनाक्रमों मे लोपमुद्रा नामक एक स्त्री का हाथ है.

हालाँकि राजगुरु का कभी भी लोपमुद्रा से सामना न्ही हुआ था मगर वी उसकी ख्याति सुन चुके थे.

लोपमुद्रा कुछ माह पूर्वा राज्य मे आई थी. उसने नकुल देव से अपने प्राणो की रखा की गुहार की क्योकि पड़ोसी राज्य मेहरानगड के राजा अतुल ने उसकी गर्दन उड़ाने के आदेश दिया था.

लोपमुद्रा एक तांत्रिक थी मगर उसने नकुल देव को विश्वास दिलाया था की वह सिर्फ़ उपासना और साधना करती है प्रयोग नही.

नकुल देव ने शुरू मे तो अनुमति न्ही दीं अगर फिर ना जाने क्यो वी मान गये और उन्होने लोपमुद्रा को राज्य के सीमावर्ती जंगलों के किनारे रहने की अनुमति दे दी

कुछ ही दीनो मे वे रक्तमणी से मिले और तुरंत ही उस पर आसक्त हो गये. महाराज जो की इतने वर्षो तक दूसरे विवाह के विरोधी थे उन्होने रक्तमणी से विवाह कर लिया. विवाह के बाद से महारानी गायत्री देवी ने महल त्याग दिया था और वे राजमहल के बाग मे बने ग्रीष्मा निवास मे रहने लगी थी.

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