मैंने चुदाई की सुरुवात मुंबई 3

मैंने चुदाई की सुरुवात मुंबई 3

बेड पर पहुँच कर उसे नीचे टिका कर हटने लगा तो उसने मेरी गर्दन पर से अपनी बाहें और कमर से टाँगे हटाई ही नहीं. उलटे उसने एक झटका देकर मुझे अपने ऊपर गिरा लिया. मैंने गिरते ही उसको बाँहों में भर लिया और उसको दबाए हुए झटके से पलट गया. वो आसानी से मेरे ऊपर आ गई. अब वो अपनी दरार को मेरे पप्पू पे, बब्बुओं को मेरे सीने पर होंठो को मेरे होंठो पर रगड़ने लगी. तभी अजय ने उसके नितंबों को पकड़ कर खोला और अपने घुटने मेरी जांघों के दोनों ओर करके, झुकते हुए स्वयं के हथियार को उसकी योनी में पीछे से घुसा दिया. सुगंधा ने अपने पुठ्ठे थोड़े हवा में ऊँचे कर दिए ताकि अजय का हथियार आसानी से अंदर बाहर हो सके. उसका दाना ठीक मेरे पप्पू पर अब और भी जोर से गड कर घिसा रहा था. मैं उसके रसीले होंठो को चूसते हुए हाथों से उसकी चुन्चियों को उमेठने लगा. अब वो लगातार घस्से मारे चला जा रहा था. इस दौरान अपने आप ही घस्सो की स्पीड बढ़ रही थी. वो भी अपने कूल्हे उचका उचका कर उसका बराबरी से साथ देने लगी. अजय ने स्पीड फूल बड़ा दी और कुछ ही देर में वो डकारने लगा. इतनी तेज़ घस्से चल रहे थे कि सुगंधा का पूरा वजूद ज़लज़ले की चपेट में आ गया था. मेरे होंठो से उसके होंठ पता नहीं कब बिछुड़ गए. अब उलटे मैंने सुगंधा को स्टेबल करने के लिए अपने हाथों से थम लिया था. घस्से मारते मारते अजय चीखता हुआ झड़ने लगा. उसकी पिचकारी ने जोर जोर से धार मारना चालू कर दी थी. धीरे धीरे उसकी रफ़्तार कम होती चली गई और अब वो बस हौले हौले सुगंधा में हिल रहा था. एक और राउंड की समाप्ति. पहला राउंड जहाँ सुगंधा के नाम रहा वहीँ दूसरा अजय के. मेरा नंबर देखो कब आता है. इधर अजय खल्लास हुआ और उधर तब तक सुगंधा फॉर्म में आ चुकी थी. वो उसके ढीले होते हथियार को हिल हिल कर और अंदर लेने की कोशिश कर रही थी. मैं उसके इन डेस्परेट प्रयासों को देख कर उसकी हालत समझ गया कि ये झड़ने के बिलकुल करीब है. मैंने उसको थोड़ा आगे खींचा. उसका योनी छिद्र मेरे पेट पर चिपके सुपाडे की जद में आया. अब छेद और सुपाड़े को इस तरह से एडजस्ट किया की पप्पू ठीक नब्बे डिग्री पर तना हुआ था और उसके ठीक ऊपर सुगंधा का छेद उसे अपने में समां लेने को तैयार. बस देर थी तो सुगंधा के उस पर दबाव देकर बैठने की. और अपने ही पल वही हुआ. मेरी मोटाई उस संकरी सी योनी के लिए थोड़ी ज्यादती थी. वो चीखती-चिल्लाती आखिर उस पर बैठ ही गई. अब अपने हाथ मेरी छाती पर टिकाये और कमर को इधर उधर हिलाते हुए उसने अंदर घुसे पप्पू को ठीक से एडजस्ट किया. मैंने अब उसकी कमर थामी और नीचे से हौले हौले तीन चार घस्से मार कर देखा कि रास्ता अंदर तक क्लियर है कि नहीं. दोनों ने क्वालिटी टेस्ट ओके कर दिया. अब शुरुवाती मूव उसने लिया. वो धीरे धीरे कमर को गोल गोल घुमा कर पप्पू को मथने लगी. उसके बब्बू भी इस घूर्णन से गतिशील होते हुए सर्कुलर मोशन में झूलने लगे. उन पर निगाह पड़ते ही मैंने अपने हाथों से उन्हें थाम लिया. लटके हुए टप्पू ज्यादा बड़े और गुदगुदे महसूस होते हैं, लिहाज़ा उन्हें मसलने में और ज्यादा मज़ा आता है. उनको अपनी पूरी हथेलियों में भरा और फिर उन्हें पिचकाने लगा. उसे ज्यादा सेंसेशन की तलाश थी तो उसने अपनी कोहनियाँ बिस्तर पर टिकाई और अपना एक चुच्चा मेरे होंठो के करीब लटका दिया. इशारा समझते ही मैंने सर उठाया और उसकी निप्पल लपक ली. अब उसने कमर को गोल हिलाने के बजाय हौले हौले से आगे पीछे करना शुरू कर दिया. मैं तन्मय होकर उसकी चुसाई कर रहा था. उधर नीचे मैं अपने दोनों हाथ उसकी एस-चीक पर ले गया और उन्हें खींच खींच कर उसके छेद पर सरसराहट पैदा करने लगा. मैंने नीचे से धक्के देने शुरू किये तो वो भी मस्तानी होके उस पर कूदने लगी. अजय मेरे पेट पर बैठ गया और उसके झूलते झालते बब्बुओं को पकड़ पकड़ कर चूसने लगा. आप यह कहानी मस्ताराम.नेट पर पढ़ रहे है | जरा ही देर में वो फिर ढेर हो गई. वो दोनों मेरे आजू बाजू अपनी पीठ के बल लेट गए. कुछ देर बाद सुगंधा मेरे पास आकर चिपक गई और गाल चुमते हुए बोलने लगी ’बहुत करारे हो यार तुम तो अभी भी झड़े नहीं हो तुम. मैं हंस दिया. फिर हम तीनो बैठ गए. मैंने अजय से पूछा ’यार ये कज़न के साथ कैसे दांव लग गया ये तो बहन ही है खराब महसूस नहीं होता. अजय बोला ’वो एक दुर्घटना वश हम दोनों एक दूसरे से ओपन हो गए और जब तक ये अहसास होता कि हम भाई बहन हैं हम बहुत नज़दीक आ चुके थे.’ अब या तो आगे बडें या मर्यादा के दायरे के बाहर ही रुक जाये. पर हम दोनों के ही मन में चोर था तो बस, नतीजा तुम देख ही रहे हो. मेरे साथ हिल हिल कर ये तो अब महा-चुदक्कड बन चुकी है. तभी सुगंधा बोली ’अभि, बताओ कैसे झडना है तुम्हे. मैं बोला ’यार मुझे तो बहुत टाइम लगेगा तो एक एक करके सभी हथकंडे अपनाओ तुम. ‘चलो पहले चूस देती हूँ’ और वो झुक कर पप्पू को चूसने लगी. १० मिनट में बुरी तरह हांफने लगी उसने निराशा में मुझसे पूछा ’ये पानी छोड़ता है कि नहीं’ मुझे हंसी आ गई. अब सुगंधा को नीचे लिटा कर सावधानी से अपना पप्पू उसकी योनी में डाला और घस्से मारते हुए उससे कहा ’जिस वक्त तू पानी छोड़ेगी ठीक उसी समय मैं भी अपनी पिचकारी छोड़ दूँगा. अब मैं घनाघन उसे रौंद रहा था काफी देर तक वो कराह कराह के मज़े लेती रही पर छूटी नहीं. मैं भी मान गया कि दम है उसमे. अब हम दोनों पलट गए. अब दोनों हाथों में उसकी कमर थामी और नीचे से जोर-जोर से पिस्टन चलने लगा वो ‘आई’ ‘आई’ करती रही. पांच मिनट और निकल गए पर वो भी हार नहीं मान रही थी शायद मेरी बात सुन कर चेलेंज ले लिया था. मैंने फिर सीन चेंज किया घोड़ी बनाकर पीछे से धक्कों की बौछार कर दी. अजय उस चौपाये के लटके थनों के नीचे घुस गया और जबरदस्त माउथ-वर्क करने लगा | अब सुगंधा हथियार डालने लगी और जोर जोर से कांपने लगी मैंने भी अपना गियर चेंज करा और लगा पिचकारी छोड़ने मेरे छींटे उसके नाज़ुक अंग में कस कस के पड़ने लगे और इतनी गर्माहट के अंदर समाने से वो जोर से झड़ने लगी ३० सेकंड तक मैं भी झड़ता रहा और बराबरी से वो भी. मस्ती में मेरा दिमाग सुन्न सा हो गया था. तूफ़ान के थमने के पश्चात अजय उसके थनों को अपने मुंह से बाहर निकालता हुआ नीचे से बाहर आया. हम दोनों निचुड कर लुड़क गए. पांच मिनट के बाद तीनो साथ साथ नहाये. सुगंधा तो मेरे पर लट्टू हो गई थी ’बोल रही थी कि इस कदर पहली बार झडी हूँ अब हफ्ते में एकाध मुलाकात तो बनती है. फिर कुछ देर बाद उन दोनों ने विदा ली ६ बज चुके थे. जाते जाते मैंने अजय से फिर पूछा ’यार कज़न के साथ बिना अपराध बोध के ये सब कैसे संभव है मेरे तो अभी भी समझ के बाहर है ये बात. अजय ने मेरा गाल थपथपाते हुए कहा………..’एक बार तू भी अपनी किसी कज़न के साथ कैसे भी करले फिर समझ में आएगा कि क्या मज़ा आता है. इतना ही कहूँगा के इसका सरूर ही अलग है. बेस्ट सेक्स. समझ गया……….. चल बाय सी यू बेक इंडिया’ वे चले गए मै आकर पलंग पर लेट गया मेरे दिमाग में झंझावत सा उठने लगा. आज से एक साल पहले की घटना की याद फिर से ताज़ा होने लगीं पुरे एक महीने तक मैं उस घटना से परेशान होता रहा और अपने आप को माफ नहीं कर पाया था मेरी आँखे बंद होने लगी और पलकों के पर्दों पर वो डीवीडी अपने आप रन होने लगीं. याद आने लगी वो सारी घटना. यही कोई एक साल पहले की बात रही होगी. ऑफिस में मुझे मेरी सगी बहन ऋतू का फोन आया ’भैया खुशखबरी है कालेज की ब्यूटी कांटेस्ट में मैं रनर्स-अप् रहीं हूँ. आप यह कहानी मस्ताराम.नेट पर पढ़ रहे है | ‘वाव् कौंग्रेट्स और संजना का क्या हुआ. मैंने अपनी चचेरी बहन का रिजल्ट पूछा. ‘होना क्या था वो तो अभी भी क्राउन सर पे पहन कर आईने के सामने से हट ही नहीं रही है और मुझे बहुत चिड़ा रही है जरा समझाओ तो भैया इसे. और उसने फोन संजना को दे दिया. ‘संजू, मेनी मेनी कोंग्रेचुलेशंस ‘थेंक्यू भैया और उससे भी बड़ी बात ये है कि हमें महाबलेश्वर का ३ दिन का फ्री होलीडे पैकेज बतौर इनाम मिला है मुझे वन प्लस वन और ऋतू को सिंगल. मैं ऋतू को तभी से छेड़ रही हूँ कि मैं तो अपने साथ भैया को ले जाउंगी, भैया मेरे से खुश हो जायेंगे…………………….आउउच, ………..संजना के बोलते ही ऋतू ने एक पिल्लो दे मारा उस पर. मैं उन दोनों की नोक झोंक का आनंद लेता रहा और उन्हें बोला कि चलो मैं आ रहा हूँ शाम को तुम दोनों को बढ़िया ट्रीट देता हूँ. फिर हम तीनो ने टूर प्लान किया और महाबलेश्वर घूमने निकल गए. वहाँ हमने ३ दिन के लिए एक SX4 टेक्सी किराये पर कर ली और घूमने लगे. दो दिन कहाँ निकल गए पता ही नहीं चला. तीसरे दिन सुबह सुबह नौ बजे बाथरूम से नहा कर मैं बाहर निकला ही था कि बेल बजी. मैंने सिर्फ टॉवेल लपेट रखा था. दरवाजा खोला तो संजू थी. वो अन्दर आके बोली… ‘भैया एक रिक्वेस्ट करनी थी, प्लीज़ आप मना मत करना.’ ‘अरे बिंदास बोलो, नहीं करूंगा मना.’…….मैं शीशे के सामने अपने बाल सँवारने लगा. ‘वो मैं अपने और ऋतू के लिए सेम सेम ड्रेस लायी थी, क्या आज दोनों वो पहन लें.’ ‘तुम लोगों ने अपनी ड्रेस के लिए मुझसे इज़ाज़त लेनी कबसे शुरू कर दी है.’ ‘वो भैया थोड़ी छोटी ड्रेस है, इसलिए इज़ाज़त लेना ज़रूरी समझा.’ ‘इतनी सी बात है अरे हमें यहाँ कौन पहचानता है गो अहेड यार.’ वो थेंक्यु बोल कर ख़ुशी ख़ुशी चली गई और मैं अपने बेग में से कपडे निकलने लगा. मैं शायद एक अंडरवियर काम लाया था तो आज के लिए बची ही नहीं थी.जींस बिना अंडरवियर के कैसे पहनू तो फिर डिसाइड किया कि काटन बरमूडा और टीशर्ट पहन लेता हूँ. तैयार होकर उनके रूम कि बेल बजायी. अन्दर जाते ही मेरे होश उड़ गए और अब अफ़सोस हो रहा था कि बिना इंक्वायरी के मैंने इन्हें परमिशन क्यों दे दी. दोनों ने ब्लू रंग की एकदम टाईट ड्रेस पहन रखी थी जो उनके वक्ष से शुरू होकर घुटनों से करीब एक फीट पहले ही समाप्त हो गई. ऊपर जहाँ कंधे, उभारों के ऊपर की छाती और उतनी ही पीठ खुली थी वहीँ नीचे जांघे और टांगे. हम तीनो ही असहज महसूस करने लगे. ऋतू तो बोल ही उठी ‘संजू, आई ऍम नॉट कम्फर्टेबल यार, दूसरी पहन लेती हूँ.’ संजू हिम्मत करके बोली…..’अब भैया ने हाँ की तभी तो पहनी, अरे फिर पहनने का मौका कहाँ मिलेगा, यहाँ हमें कौन पहचानता है क्यों भैया.’ ‘चलो आज पहन लो, तुम लोगों का शौक भी पूरा हो जायेगा चलो जल्दी से नीचे आओ’……….कहकर मैं चला गया. दोपहर तक हमने काफी सारी साईट-सीइंग कर ली थी. फिर ४ बजे हम सनसेट पॉइंट पर आ गए. काफी भीड़ होने लगी थी. हम लोगो ने सोचा कि चलो पास की एक पहाड़ी पर चढ़ कर देखेंगे. लेकिन जाने का कोई रास्ता नहीं तो नहीं था पर हमने पगडण्डी वाला एक रास्ता ढून्ढ ही लिया और आसानी से २५-३० फीट ऊँची उस पहाड़ी पर आ गए पर वहां कोई भी नहीं था. हमने पहाड़ी के पश्चिमी किनारे पर एक चादर बिछाई और आराम से बैठ गए. टाईट और छोटे कपड़ों के कारण उन्हें बहुत प्रोब्लम हो रही थी तो वो दोनों अपनी टाँगे साइड में मोड़ कर बैठ गईं. मैंने दिन भर में मार्क किया कि वे दोनों बार बार अपनी ड्रेस, उभारों के ऊपर खींचती थी कि कहीं खिसक कर वक्ष को खुला ना करदे. पहली बार जो पहनी थी ऐसी ड्रेस. हम वहीँ बैठे बैठे सन-सेट का नज़ारा लेने लगे. थोड़ी देर के बाद संजू उठ कर एकदम किनारे की ओर चली गई और खड़े होकर देखने लगी. उसके ठीक आगे २०-२५ फीट का खड़ा ढलान था, जो खतरनाक तो नहीं था पर अगर फिसले तो पूरा शरीर छिल कर घायल हो सकता था. मैं उसे बुलाता रहा पर वो बोली कि आप चिंता ना करें मैं कोई बच्ची थोड़े ही हूँ. परन्तु उसे वहाँ खड़े देखकर मुझे डर बना ही रहा. अंत में मैंने ऋतू को बोला कि वो ऐसे नहीं मानेगी, मैं अभी उसे खींच कर लाता हूँ. आप यह कहानी मस्ताराम.नेट पर पढ़ रहे है | मैं उठ कर धीरे से उसके पीछे पहुंचा. उसे मेरे आने का अहसास हो गया. सहज ही वो चमक एकदम से पलटी. उसका पलटना हुआ और मेरा एन उसके पीछे पहुंचना हुआ. हडबड़ी में उसका कन्धा मुझसे टकराया और वो लड़ खड़ा कर ढलान में फिसलने लगी. गिरते हुए उसके हाथ मेरे टीशर्ट के गोल गले पर पड़े और उसने मुठ्ठी में भींच लिया. मैंने भी उसे ढलान पर फिसलने से बचाने के लिए उसके दोनों बाजुओं को पकड़ा. बस यहीं गड़बड़ हो गई उसके फिसलते शरीर के वजन से मेरा भी बेलेंस बिगड़ा और मैं भी उसके साथ खींचता चला गया. हम दोनों ही ढलान पर स्लिप होने लगे…मैं पीठ के बल फिसला और वो पेट के बल. उसका पेट मेरे पैरों पर था और उसने छाती से मेरी टीशर्ट भींच रखी थी मैं उसकी भुजाओ को कस के पकड़ा हुआ था. करीब ५ फीट फिसलने के बात मेरा जूता एक पत्थर के नुक्के से सट गया. मैं तो रुक गया पर संजू अपने ही वजन से नीचे सरकती जा रही थी. मेरे हाथों से उसकी बाहें फिसलती हुई निकली जा रही थी. उसका सारा दबाव उसकी मुठ्ठी में जकड़े मेरे कॉटन के पतले से टीशर्ट पर पड़ा और वो बेचारा चर्र्र्रर्र्र्रर से फटने लगा. वो पेट के बल नीचे सरकती ही जा रही थी. मेरे हाथ से उसके हाथ लगभग छूट चुके थे. पर तभी उसकी उँगलियों के क्लेम्प मेरे बरमूडा के एलास्टिक में फँस गए और उसके साथ साथ वो भी नीचे सरकने लगा. पीछे से तो वो टाईट फंसा था लेकिन आगे से खिसक कर वो मेरी जांघो तक आ गया और अंदर चड्डी नहीं होने के कारण मेरा चार इंची मुरझाया पप्पू एकदम से उघड गया. उसकी आँखों के सामने मेरा खुला पप्पू………….. मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस होने लगी. इन सबमें हालांकि एक अच्छी बात ये हुई कि अब वो मेरे बरमूडा से लटक कर रुक चुकी थी. हमारे फिसलते ही ऊपर ऋतू दौड़ कर आई और जब उसने झाँक कर हमें देखा तो उसकी चीख निकल गई. वो बदहवास सी बोली ‘भैया संभाले रहना मैं कुछ करती हूँ. इस बीच संजू के पैरों ने भी कुछ सहारा खोज लिया और वो जोर लगा कर कुछ ऊपर सरकी और मेरे हाथों में अपने हाथ दे दिए. मैंने उसे ऊपर खींचना शुरू किया तो उसकी दोनों कलाइयाँ मेरे सोये हुए पप्पू से रगड़ खाने लगी. उसके साथ साथ मेरा बरमूडा भी थोडा ऊपर सरका परन्तु वो मेरी अंडकोष की थैली के एन नीचे जाकर अटक गया और मेरा पप्पू खुला का खुला ही रह गया. अब उसने अपने हाथों से मेरी कमर थाम ली पर इसी वक़्त उसका मुंह मेरी गोटियों से जा लगा. उसने बुरा सा मुंह बनाकर उसे साइड में किया तो उसका एक गाल तो मेरी गोटियों पर आ गया और सर मेरे पप्पू पर. मेरे चुभते बालों से बचने के लिए वो चेहरा इधर उधर करने लगी तो मेरा पप्पू उसके माथे से लगातार रगड़ खाने लगा और थोड़ी सी उत्तेजना के बढने से वो तनाव में आने लगा. ऐसे विकट हालात में भी उसकी सक्रियता, मेरे स्वयं के लिए भी आश्चर्यजनक थी. अब संजू मेरी कमर पर जोर लगाते हुए थोडा और ऊपर आई पर नीचे उसे सपोर्ट नहीं मिल पा रहा था | आप यह कहानी मस्ताराम.नेट पर पढ़ रहे है | तो वो वहीँ की वहीं अटकी रह गई. अब इस वक़्त उसके गाल के ठीक नीचे मेरा पप्पू दबा हुआ था. तभी मुझे लगा के मुझ पर वजन बढ़ रहा है तो मैंने संजू को आगाह किया ’तू मुझे ऐसे ही कस के पकडे रहना, मैं हाथ छोड़ रहा हूँ. और कुछ सपोर्ट ढूँढना पड़ेगा. उसने मुझे और कस के पकड़ लिया और मैंने दोनों हाथों से पथ्थरों के नुक्कों का सपोर्ट खोजा और दोनों को खिसकने से बचाया. अब मेरे दोनों हाथ और एक पैर फ्रीज़ हो चुके थे, और वो मेरी कमर को कस कर पकडे मुझ पर ऐसे लटकी हुई थी कि उसके गाल, ठीक मेरे उघडे पप्पू पर ……….. दोनों बब्बू मेरी जान्धों पर ………………….. पेट मेरे पैरों पर और दोनों पंजे हवा में लटके हुए. अब वो डर के मारे हिल भी नहीं रही थी कि कहीं वो फिर नीचे ना खिसक जाये. उधर ऊपर ऋतू ने चादर को लम्बाई में घडी कर के एक साइड गठान बांधी और अब ठीक हमारे सर के ऊपर आकर बोली….’भैया ये चादर का सहारा लेकर ऊपर आने की कोशिश करो’…..और फिर उसने गठान वाला हिस्सा नीचे लटका दिया. चादर छोटी हो जाने के कारण वो गठान मेरे सर के काफी ऊपर थी. इसका मतलब संजू को और ऊपर आना पड़ेगा तब कहीं जाकर वो उसे पकड़ पायेगी. संजू अपने पैरों से सपोर्ट की तलाश करने लगी. इतना मसला मसली की वजह से मेरा पप्पू अब आधा खड़ा हो चला था और उसके गाल पर चुभने लगा

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