देवर जी चोद दिया ना अपनी भाभी को

देवर जी चोद दिया ना अपनी भाभी को

मेरा नाम रजनी सैलानी है | मै भारत के एक छोटे से शहर की रहने वाली हूँ Antarvasna Kamukta Hindi sex Indian Sex Hindi Sex Kahani Hindi Sex Stories मेरे पिताजी काफी पैसे वाले है । मेरे पास स्वयं की बहुत सम्पति थी। मेरे पति गोपाल जात एक कांट्रेक्टर है। हमारा प्रेम विवाह था, मेरी जिद पर मेरे पिताजी ने हमारी शादी करवा दी । मेरी पतिदेव बहुत ही बिजी रहते थे, उनके पास किसी भी काम के लिये समय नहीं था। अक्सर रात को काम से आने के बाद खाना खा के बिना चोदे सो जाते थे | एक तो उनकी एक बुरी आदत दारु पिने की थी बिना पिए उनको नीद ही नही आती थी | मई में उनका भाई अंकित ग्रेजुएशन करके घर पर आ गया | मेरे पति अब तो एकदम ही चुदाई में मन नही लगाते थे । पर जवानी का तकाजा है चुदना … बिना चुदाई के मेरी मदमस्त जवानी तड़पने लगी थी। फिर मेरी जैसी आदत थी कि मुझे आराम अधिक पसन्द था। खालीपन में मेरे दिमाग में बस सेक्स की बातें ही अधिक आया करती थी। पैसा अधिक होना भी अय्याशी का एक कारण होता है। अधिकतर तो मेरी नजर तो अब हर किसी लड़के के पैंट के अन्दर लण्ड तलाशती रहती थी। अंकित के यहाँ आने के बाद मेरी अय्याश नजरें अंकित की ओर उठने लगी थी। वो एक मस्त भरपूर जवान लड़का था। जब वो रात को पजामा पहनता था तो उसके मस्त चूतड़ की गोलाइयां मेरे दिल को छू जाती थी। उसके लण्ड के उभार की झलक मेरे मन में वासना का गुबार भर देती थी। उसे देख कर मैं मन मसोस कर रह जाती थी। जाने कब वो दिन आयेगा जब मेरी मन की मुराद पूरी होगी। मुझे पता था कि मेरे पड़ोस की लड़की अभिलाषा को वो मन ही मन चाहता था। वो अभिलाषा ही मेरा जरिया बनी। मेरे मन में अभिलाषा और अंकित को मिलवाने की बात समझ में आने लगी। “अंकित, अभिलाषा तुझे पूछ रही थी, क्या बात है?
“सच भाभी, वो मुझे पूछ रही थी, क्या कह रही थी?”
“आय हाय, बड़ी तड़प उठ रही है, मिलेगा उससे?”
“बस एक बार मिलवा दो ना, फिर जो आप कहेंगी मै आप के लिये करूंगा !”
“सोच ले, जो मै कहूंगी, फिर करना ही पड़ेगा …” मै हंसने लगी।
फिर मैंने अंकित को पटाने के लिये उसे मैंने अभिलाषा से मिलवा दिया। उसके घर आते ही मैंने अभिलाषा से भी यही बात कही तो वो शरमा गई। अभिलाषा एक तेज किस्म की चालू टाईप की लड़की थी। उसके कितने ही आशिक थे, मेरी तरह वो भी जाने कितनी बार अब तक चुद चुकी थी। अभिलाषा के ही कहने पर मैंने उसे और अंकित को मेरे बगल वाले कमरे में बातें करने की आज्ञा दे दी। मुझे पता था कि वो बातें क्या करेंगे, बल्कि अन्दर घुसते ही चुदाई के प्रयत्न में लग जायेंगे।
…और हुआ भी यही ! मैं चुपके से उन्हें देखती रही। वे दोनों भावावेश में एक दूसरे से लिपट गये थे। फिर कुछ ही देर में चूमा चाटी का दौर चल पड़ा था। अभिलाषा के वक्ष स्थल पर अंकित ने कब्जा कर लिया था और कपड़े के ऊपर से ही उसके उभारों को मसल रहा था। अभिलाषा के हाथ भी अंकित के लण्ड को पकड़ चुके थे।
मुझे लगा कि इसके आगे तो अभिलाषा चुद जायेगी, और एक बार अंकित ने उसे चोद दिया तो उनके रास्ते खुल जायेंगे फिर तो वे दोनों कहीं भी चुदाई कर लेंगे।
मैंने दरवाजे पर दस्तक देकर उन्हें रोक दिया।
अभिलाषा ने दरवाजा खोला, उसके वासना से भरे गुलाबी आँखों के डोरे सब कुछ बयान कर रहे थे।
“मिल लिये अब बस, अब कल मिलना !”
अभिलाषा के नयन झुक गये। उसने अपने कपड़े ठीक किये बालों को सेट किया और बाहर आ गई।
“अंकित, अब बाहर भी आ जाओ !”
“भाभी अभी नहीं, रुको तो !”
अभिलाषा ने मुझे शरमा कर देखा और जल्दी से बाहर निकल गई। मैं अंकित को देखने के लिये कमरे में घुस गई। उसका लण्ड तन्नाया हुआ था। मुझे देखते ही वो जल्दी से घूम गया।
“क्या छिपा रहे हो अंकित? मुझे भी तो बताओ !”
“कुछ नहीं भाभी, आप जाओ…”
“ऊ हुं … पहले बताओ तो …” मैंने जान कर के उसके सामने आ गई।
“उई मां … अंकित ये क्या !!!” और मैं जोर से हंस पड़ी।
उसने शरम के मारे अपने दोनों हाथ लण्ड के आगे रख दिये और उसे छिपाने की कोशिश करने लगा।
“मजा आया ना अभिलाषा के साथ … ऐ ! क्या क्या किया … बता ना?”
“कुछ नहीं किया भाभी…”
“वो तो, तुम्हारे हाव भाव से पता चल चल रहा है कि क्या किया … उसे मजा आया?”
उसने अचानक मुझे कंधों से पकड़ लिया और अपनी ओर खींच लिया।
“अरे यह क्या कर रहा है… छोड़ दे … देख लग जायेगी।”
उसकी सांसें तेज हो गई थी, उसका दिल तेजी से धड़कने लगा था। उसने मुझे कस कर जकड़ लिया। मुझे उसका सीधे आक्रमण करना बहुत अच्छा लगा।
“बस भाभी, कुछ ना बोलो … मुझे करने दो…” वो लगभग हांफ़ता हुआ बोला।
मुझे और क्या चाहिये था ! मैं उसकी बाहों में ना ना करते हुये समाने लगी। मेरी कल्पनायें साकार सी होती लगी। अब तो उसके कड़क लण्ड का स्पर्श भी मेरी चूत के आसपास होने लगा था। तभी उसके हाथों ने मेरे सीने को दबा दिया।
मेरे मुख से आह सी निकल गई। मेरे मन में उसका लण्ड थामने की इच्छा होने लगी। तभी वो झटके से अलग हो गया।
“ओह भाभी … मैं यह क्या करने लगा था … मुझे माफ़ कर देना !”
“एक तो शरारत की… फिर माफ़ी … बड़े भोले बनते हो…” मैंने कातर स्वर में कटाक्ष किया।
वो सर झुका कर हंस दिया। ओह … हंसा तो फ़ंसा ! अब कोई नहीं रोक सकता मुझे … समझो उसके मस्ताने लण्ड का मजा मुझे मिलने ही वाला है।
अभिलाषा को चोदने की आशा में मैंने उसे फ़ंसा लिया था, अब तो अभिलाषा गई भाड़ में ! कमबख्त को घर में घुसने ही नहीं दूंगी।
शाम को पतिदेव जब दारू पी कर खर्राटे भरने लगे। बाहर मौसम बहुत सुहावना हो रहा था, बादल गरज रहे थे, लगता था कि तेज बरसात होने वाली है।
ठण्डी हवा चलने लगी थी। रात भी गहरा गई थी, मन का मयूर कुछ करने को बेताब हो रहा था। तो मेरे मन में वासना का शैतान बलवान होने लगा। मैंने पति को झकझोर के उठाने की कोशिश की पर वो तो जैसे दारू की मदहोशी में किसी दूसरी दुनिया में खो चुके थे। मैंने जल्दी से एक दरी ली और छलांगें मारती हुई छत पर आ गई।
उफ़्फ़, कितनी ठण्डी बयार चल रही थी। तभी अंकित ने मुझे आवाज लगाई। मैंने नीचे झांक कर देखा फिर कहा- ऊपर आ जाओ मस्त मौसम है।
वो पजामा पहने हुए था। वो भी छत पर आ गया। हवायें तेज चलने लगी थी। मुझे लगा कि अंकित की नीयत मुझे देख कर डोल रही है। पजामे में उसका लण्ड खड़ा हुआ था। वो बार बार उसे मसल रहा था। मुझे लगा लोहा गरम है और यही गरम गरम लोहा मेरी चूत में उतर जाये तो अन्दर का माल पिघल कर बाहर आने में देरी नहीं करेगा। वो मुझे टकटकी लगा कर देख रहा था।
“क्या हो रहा है देवर जी … किसकी याद आ रही है?”
“जी, कोई नहीं … मैं तो बस…”
“होता है जी, जवानी में ऐसा ही होता है … अभिलाषा की याद आ रही है ना?”
मैं उसके काफ़ी नजदीक आ गई और उसकी बांह पकड़ ली। तभी जोर की बिजली तड़की।
मैं जान कर सहम कर उससे जा चिपकी।
“हाय रे, कितनी जोर से बिजली चमक रही है।”
उसने भी मौका देखा और मुझे जोर से जकड़ लिया। मैंने नजरें उठा कर उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में वासना के लाल डोरे उभरे हुये थे। मैंने उसे और उतावला करने के लिये उसे धीरे से दूर कर दिया।
अभिलाषा को बुला दूँ क्या…?
“ओह भाभी, इतनी रात को वो कैसे आयेगी।”
मैंने छत पर दरी बिछा दी और उस पर लेट गई- अच्छा दिन में उसके साथ क्या क्या किया था। देखो साफ़ साफ़ बताना…।
“वो तो भाभी मैंने उसे…!”
“चूम लिया था… है ना… फिर उसकी छाती पर आपकी नजर पड़ी…”
तभी बरसात की हल्की हल्की बूंदें गिरने लगी। मैं तो मात्र पेटीकोट और ब्लाऊज में थी, भीगने सी लगी।
“आपको कैसे पता… जरूर आपने छुप कर देखा था…”
“ऊंह … जवानी में तो यही होता है ना…”
बरसात धीमी होने लगी थी। मैं भीगने लगी थी।
“भाभी उठो … नीचे चलते हैं।”
तभी बिजली जोर की चमकी और एकाएक तेज बरसात शुरू हो गई। मैंने अपने हाथ और पांव फ़ैला दिये।
“देवर जी, तन में आग लगी हुई है… बदन जल रहा है… बरसात और तेज होने दो…”
मैंने देवर का हाथ जोर से पकड़ लिया। वो भी भीगता हुआ मुझे देखने लगा। उसने एक हाथ से अचानक मेरे गाल सहला दिये। जाने क्या हुआ कि उसके होंठ मुझ पर झुकते गये… मेरी आँखें बन्द होती गई। हम दोनों के हाथ एक दूसरे पर कसने लगे। उसके लण्ड का उभार अब मेरी चूत पर गड़ने लगा था। उसके हाथ मेरे चूतड़ों पर आ गये थे और गोलों को धीरे धीरे सहलाने लगे थे।
पानी से तर बेसुध होकर मैं तड़प उठी।
“देवर जी, बस अब छोड़ दो !”
“भाभी, ऐसा ना कहो … मेरे दिल में भी आग लग गई है।”
“देख ना कर ऐसा ! मैं तुझे अभिलाषा से भी जोरदार लड़कियों से दोस्ती करा दूँगी, उनके साथ तू चाहे जो करना, पर अब हट जा।

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